दिल्‍ली वालों की कृपा से ऋषिकेश में आत्‍मा आपसे वार्तालाप कर सकती है

  • सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ. ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ ...
पहला वाक्‍य पढ़कर आप हैरान हो रहे होंगे। ऐसे कैसे संभव है कि आत्‍मा आपसे बात कर ले। हां, मेडिटेशन करते हुए आप जरूर अंदर झांककर आत्‍मा से कुछ चर्चा-वर्चा कर लेते होंगे। आत्‍मा ही बाहर निकलकर आपसे रूबरू हो जाए तो आप क्‍या करेंगे। इस रहस्‍य से कुछ मिनट में ही पर्दा उठाएंगे। आप ऋषिकेश की यात्रा पर आगे बढ़ते जाइये। 


गाइड मूवी का एक डॉयलॉग है 

न सुख है

न दुख है

न दीन है

न दुनिया 

न इंसान

न भगवान 

सिर्फ मैं हूं 

मैं हूं 

मैं हूं 

मैं हूं

सिर्फ मैं 


इसी दर्शन के साथ नौ नौजवान (उम्र पर मत जाइये) रिषिकेश यात्रा पर रवाना हुए। दो गाडि़यां। चूंकि रवि धवन का आग्रह रहता है कि कोई अपशब्‍द नहीं बोलेगा। इन दो दिनों के लिए इन आठ नौजवानों ने विशेष छूट की स्‍वीकृति करवा ली थी। पर ये स्‍वीकृति होते हुए भी पांच नौजवानों ने तय किया कि वे अलग गाड़ी में बैठेंगे, जहां वे बादलों को नीचे ला सकें। आप समझ गए होंगे। गाड़ी को धुएं से भर सकें। 



ब्‍लैकडॉग  सोमरस लेते समय कोई रोक-टोक न हो। दूसरी गाड़ी में चार नौजवान बैठे। रवि धवन उसी में थे। खैर, इस गाड़ी में भी बादल नीचे तो आए लेकिन अंदर तक डूब नहीं सके। खिड़की से ही बाहर निकलते रहते। दूसरी गाड़ी में बादलों ने कुछ डेरा ऐसा लगाया, कि आप कल्‍पना कर लें कि बादल भी इनके साथ जैसे सोमरस का आनंद लेने के लिए जाम छलका रहे हों। जून की गर्मी में अवकाश के दिनों में अगर आप ऋषिकेश जा रहे हैं तो अपने साथ संयम की पोटली जरूर बांध लें, क्‍योंकि हरिद्वार से आगे पंद्रह किलोमीटर का रास्‍ता पांच घंटे में ही नापा जा सकता है। अगर संयम की पोटली नहीं है आपके पास तो गाड़ी में बैठे कृत्रिम बादल ही आपको सहारा दे सकते हैं। 



पांच नौजवानों की गाड़ी में संयम की पोटली नहीं थी। वे बादलों के साथ अठखेलियों में मग्‍न थे। रवि धवन की गाड़ी में बैठे चार नौजवानों में से एक नौजवान को इस बात की चिंता थी कि सोमरस तो दूसरी गाड़ी वाले संपन्‍न कर जाएंगे। खर्चा बराबर पड़ जाएगा। हां, एक नौजवान ऐसा था, जिसे न बादलों की फि‍क्र थी, न सोमरस की। नवयुवतियों की दिलों की धड़कन इस नौजवान की नजरें केवल फोन पर ही गड़ी रहतीं। कब किस नवयुव‍ती का संदेश आ जाता, वो उसी का जवाब देने लग जाता। फोन पर अगर बात भी करनी होती तो इस अंदाज में करता कि साथ बैठे को कानों-कान पता न चले। 

खैर, कुछ कुछ शब्‍द हम तक पहुंच जाते। वो गाइड की तरह ऐसी मनमोहक बात कहता की नवयुवती के पास कोई जवाब ही नहीं होता 

लगता है कि आज हर इच्‍छा पूरी होगी

पर मजा देखो

आज कोई इच्‍छा ही नहीं रही 

सुबह चार बजे निकले थे। दो बजे ऋषिकेश पहुंचे। आपके टूर में अगर कोई ज्ञान बांटने वाला हो तो जितना आप सोच रहे हैं, राफ्टिंग का डर उससे ज्‍यादा बढ़ जाएगा। इसलिए ज्ञानी पुरुष से आप निवेदन कर सकते हैं कि कम बताएं। इस तरह बताएं कि उत्‍साह बढ़े। डराए नहीं। जैसे कि राफ्टिंग कर चुके ज्ञानी नौजवान आपसे कहेंगे कि चप्‍पू को चप्‍पू नहीं बोलना है। 

इसे पैडल कहना है। अगर आप गंगा में गिर जाएं तो होश में रहें। घबराए नहीं। आपको बचा लिया जाएगा। शांत हो जाएं। चप्‍पू...सॉरी पैडल चलाते समय हाथ को इस तरफ रखें। दूसरे व्‍यक्ति को ये पैडल लग सकता है। लहरें बहुत तेज आती है। बोट 90 डिग्री पर खड़ी हो जाती है। पर आप एन्‍जॉय बहुत करेंगे। 

ज्ञानवर्धक बातें सुनते-सुनते हम अपने डेस्टिनेशन पर पहुंचे। यहां बोट के कप्‍तान अगर समझदार नहीं हैं तो समझिए आप भगवान के भरोसे ही हैं। इसलिए अपने विवेक का इस्‍तेमाल करके सबसे पहले कप्‍तान की परख जरूर कर लें। हम नौ नौजवान (आपको याद दिलाता रहूं) दो बोट में सवार हुए। गाड़ी वाले पांच नौजवान अलग बोट में थे। जिस तरह इंद्र देव के दरबार में सोमरस छलकता है, ठीक उसी तरह ये गाड़ी में लोटपोट होते हुए पहुंचे थे। चप्‍पू सॉरी पैडल इनके हाथों में ही डोल रहा था। 



एक नौजवान का यही ज्ञान था, किसी भी हाल में चप्‍पू नहीं छूटना चाहिए। चप्‍पू चलता ही रहना चाहिए। अगर आपका चप्‍पू नहीं चला तो आप गंगा में गिर सकते हैं। सबसे पहले चप्‍पू उनका ही छूटा। चप्‍पू पर उनका कोई बस नहीं चला। बोट के कप्‍तान ने आखिरकार उन्‍हें सबसे आगे रस्‍सी पकड़वाकर बैठा दिया। बाकी के चार नौजवान भी अमली के ही दोस्‍त थे। 

इन्‍होंने भी चप्‍पू बोट के हवाले कर दिया। बैठ गए आराम से। कप्‍तान ने भी इनसे आस छोड़ दी। बोट को भगवान के हवाले कर दिया। आढ़ी टेढ़ी होती हुई पांच नौजवानों की बोट किसी तरह किनारे पहुंच गई। सबक यही सिखा कि राफ्टिंग के वक्‍त कोई मजाक नहीं होना चाहिए। बादलों का शौक बाद में भी पूरा किया जा सकता है। चप्‍पू सबसे जरूरी है। 

लटकते-भटकते हम सभी अपने कैंप में पहुंचे। इंस्‍टा या फेसबुक पर आप टैंट कैंप की तस्‍वीरें देखकर बहक न जाएं। सीजन के दिनों में दो से तीन हजार रुपये प्रति व्‍यक्ति तक शुल्‍क लगा सकते हैं। खाने के नाम पर मूंगदाल ही मिलेगी। जो पहले जा चुके हों, उनसे राय जरूर लें। या जो कैंप में ठहरे हों, उनसे रिव्‍यू मांग लें। तभी बुक करें। इनसे पहले होटल हो सकते हैं। कैंपिंग के नाम पर यहां पर खुलेआम शराब पीते हुए लोग दिखेंगे। परिवार के साथ जाने से यहां बचा जा सकता है। 

खैर ये तो हुई काम की बात। अब आपते हैं आत्‍मा से वार्तालाप के रहस्‍य पर। दिल्‍ली का कोई शैतान नौजवान आपकी यात्रा पर हो तो आपका शब्‍दकोष बढ़ सकता है। बशर्ते आप अपने शब्‍दकोष में दूषित ड्रेनेज शब्‍द भी रखना चाहते हैं। मैंने तो पहली बार .**मरा शब्‍द सुना।  ऐसे मेंटलपीस भी दुनिया में हो सकते हैं जो सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए सिगरेट को छिपाते हुए ये कहें कि चाय गर्म है। उसी का धुआं निकल रहा है। आप महज मुस्‍कुरा ही सकेंगे इस बात पर।  

दिल्‍ली वाले सिगरेट भी ऐसी पिला सकते हैं, जो आपने न कभी देखी और न सुनी। एक नौजवान ने जोश जोश में बिना किसी की सुने तीन चार सिगरेट के दम घोंट लिए। धुआं अंदर जाता गया और वह खुद बाहर आते गए। एक घंटे के अंदर नौजवान अपनी होशसीमा को पार करके आसमानी चरम पर थे।उन्‍हें लगा कि उनकी मृत्‍यु हो चुकी है। 

मैं मर चुका हूं। पर 

मौत एक ख्‍याल है

जैसे जिंदगी एक ख्‍याल है 

मेरी आत्‍मा बाहर निकल चुकी है। क्‍या तुम्‍हारी आत्‍माएं भी मुझसे बात कर रही है। मुझे एक चाकू की जरूरत है। 

पर क्‍यों। चाकू क्‍यों चाहिए आपको। 

मुझे चेक करना है। 

क्‍या चेक करना है। 

मुझे देखना है कि इस नौजवान की आत्‍मा भी निकल चुकी है। 

किस नौजवान की बात कर रहे हैं आप। 

इसी नौजवान की, जिसकी पता नहीं कितनी सेटिंग हैं। शादी की उम्र निकलती जा रही है। इसके किस्‍से खत्‍म नहीं हो रहे। 

पर आप तो मर चुके हैं। आपको इससे क्‍या मतलब। 

मुझे मतलब है। इसकी आत्‍मा से बात करनी है मुझे। मुझे भरोसा नहीं हो रहा है। क्‍या मैं अकेला ही मरा हूं। मैं सभी को मारकर ही मरूंगा। 

ऐ आत्‍मा। तू मेरे से दूर क्‍यों खड़ी है। पास आ। 

ये आत्‍मा मुझसे बात कर रही है। तुमसे क्‍यों नहीं बात कर रही। 

आपकी आत्‍मा है तो आपसे ही बात करेगी। 

इसलिए मुझे चाकू चाहिए। तुम सालों मरे नहीं हो। जब मरोगे तो सारी आत्‍माएं इकटठी होंगी। तब मुझे चैन पड़ेगा। 

इस तरह बातें करते हुए हम नौजवान को बेड पर सुलाते। वे फि‍र खड़े हो जाते। चाकू या चम्‍मच ढूंढते। उन्‍हें आशिक नौजवान की आत्‍मा निकालने की धुन सवार थी। ये तो अच्‍छा हुआ कि आशिक नौजवान दूसरे कमरे में जा चुका था। नहीं तो संभव है कि उसकी आत्‍मा निकालकर ही मानते वो सर। 

सुबह होने तक उनके अनुसार, उनकी आत्‍मा वापस शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। यात्रा के दो सप्‍ताह बाद भी वह इस बात को स्‍वीकार करते हैं कि उनकी आत्‍मा बाहर निकल चुकी थी। वे दूसरी आत्‍माओं को भी बाहर निकालना चाहते थे। 

आखिर में यही सलाह देना चाहूं‍गा कि राफ्टिंग के वक्‍त अपने कप्‍तान की सुनें। खूब एन्‍जॉय करें। कुछ नहीं होगा। कुछ भी नहीं होगा। अगर गिरेंगे तो आपको आसानी से बचा लिया जाएगा।

पांच नौजवानों ने अंत तक बादलों को ऊपर नहीं जाने दिया। अपने आसपास समेटे रहे। हमारी गाड़ी के नौजवान उसी गाड़ी में जाना चाहते थे लेकिन जा नहीं सके। अंत में उन्‍होंने यही सोचकर दिल बहलाया 

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया

ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया

ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया,

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

आप दुनिया को काले कुत्‍ते एवं बडवाइजर बीयर से जोड़ सकते हैं। 

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